6 नवंबर 2019 - 15:34
ईरान ने 6 नवंबर को चौथा क़दम क्यों उठाया, चौथे क़दम की विशेषतायें क्या हैं?

ईरान ने 6 नवंबर को चौथा क़दम क्यों उठाया, चौथे क़दम की विशेषतायें क्या हैं?

ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहान की घोषणा के अनुसार तेहरान ने परमाणु समझौते के परिप्रेक्ष्य में 6 नवंबर से चौथा कदम उठा लिया है। राष्ट्रपति रूहानी ने आदेश दिया है कि फोर्दू परमाणु संयंत्र में काम करने वाली संट्रीफ्यूज मशीनों में अब गैस इंजेक्ट की जायेगी। ईरान ने यूरोपीय देशों को दो महीने का समय दिया था कि वे परमाणु समझौते में अपने वचनों पर अमल करें अन्यथा ईरान चौथा कदम उठायेगा।

ईरान ने परमाणु समझौते की प्रतिबद्धता को जो कम किया है वह दो आयामों से महत्वपूर्ण है।

पहला यह कि परमाणु समझौते के परिप्रेक्ष्य में तय यह पाया था कि शोध व अध्ययन कार्यों के लिए 1044 सेंन्ट्रीफ्यूज मशीनें काम करेंगी किन्तु इनमें गैस इंजेक्ट नहीं की जायेगी जबकि अब इनमें गैस इंजेक्ट की जायेगी।

दूसरा यह कि यूरेनियम का संवर्द्धन अब और विस्तृत पैमाने पर होगा यानी फोर्दू परमाणु संयंत्र में यूरेनियम का संवर्द्धन अब 5 प्रतिशत तक किया जायेगा। अलबत्ता ईरान 20 प्रतिशत तक यूरेनियम का संवर्द्धन कर सकता है परंतु अभी उसकी कोई ज़रूरत नहीं है।

ईरान चरणबद्ध तरीक़े से परमाणु समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कम कर रहा है और अगर यूरोपीय देशों ने अपने वचनों पर अमल किया तो ईरान चौथे चरण से भी वापस आ सकता है। जैसाकि उसने पहले, दूसरे और तीसरे चरम में भी यही कहा था कि अगर यूरोपीय देशों ने अपने वचनों का पालन किया तो वह इन चरणों को खत्म करके आरंभिक स्थिति में आ जायेगा।

आठ मई 2018 को अमेरिका एक पक्षीय रूप से परमाणु समझौते से निकल गया था। दूसरे शब्दों में व्यवहारिक रूप से उसने परमाणु समझौते पर अमल ही नहीं किया। यूरोपीय संघ भी वही कर रहा है जो अमेरिका ने किया किन्तु दोनों में अंतर यह है कि अमेरिका एक पक्षीय और ग़ैर कानूनी तरीके से परमाणु समझौते से निकल कर उस पर अमल नहीं किया जबकि यूरोपीय संघ इस समझौते में रहकर अपने वचनों पर अमल नहीं कर रहा है।

रोचक बात यह है कि अमेरिका इस समझौते से निकल चुका है और वह ईरान का आह्वान करता है कि उसे चाहिये कि वह परमाणु समझौते पर अमल करे। यही नहीं अमेरिका ईरान पर अधिक से अधिक आर्थिक प्रतिबंध लगा रहाहै दबाव डाल रहा है ताकि उसे अपनी वर्चस्ववादी मांगों के सामने झुकने पर मजबूर कर दे परंतु गत चालिस वर्षों के अनुभवों ने दर्शा दिया है कि ईरान न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की किसी भी वर्चस्वादी सरकार के सामने नहीं झुकेगा और अगर ट्रंप सरकार ने अतीत के अनुभवों से पाठ लिया होता तो वह ईरान पर अधिक से अधिक दबाव डाल कर उसे झुकाने का स्वप्न न देखती।